श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तेनावसृष्टः सहसा कृत्वावाक् शिर आतुरः।

विनिष्क्रामति कृच्छ्रेण निरुच्छ्वासो हतस्मृतिः॥ २३

tenāvasṛṣṭaḥ sahasā kṛtvāvāk śira āturaḥ|

viniṣkrāmati kṛcchreṇa nirucchvāso hatasmṛtiḥ|| 23

अर्थ

उसके सहसा ठेलनेपर वह बालक अत्यन्त व्याकुल हो नीचे सिर करके बड़े कष्टसे बाहर निकलता है। उस समय उसके श्वासकी गति रुक जाती है और पूर्वस्मृति नष्ट हो जाती है॥ २३॥✎ 343

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #343 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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