इसी प्रकार बाल्य (कौमार) और पौगण्ड—अवस्थाओंके दुःख भोगकर वह बालक युवावस्थामें पहुँचता है। इस समय उसे यदि कोई इच्छित भोग नहीं प्राप्त होता, तो अज्ञानवश उसका क्रोध उद्दीप्त हो उठता है और वह शोकाकुल हो जाता है॥ २८॥
इत्येवं शैशवं भुक्त्वा दुःखं पौगण्डमेव च।
अलब्धाभीप्सितोऽज्ञानादिद्धमन्युः शुचार्पितः॥ २८
इसी प्रकार बाल्य (कौमार) और पौगण्ड—अवस्थाओंके दुःख भोगकर वह बालक युवावस्थामें पहुँचता है। इस समय उसे यदि कोई इच्छित भोग नहीं प्राप्त होता, तो अज्ञानवश उसका क्रोध उद्दीप्त हो उठता है और वह शोकाकुल हो जाता है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 393) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/28/