श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

इत्येवं शैशवं भुक्‍त्वा दुःखं पौगण्डमेव च।

अलब्धाभीप्सितोऽज्ञानादिद्धमन्युः शुचार्पितः॥ २८

ityevaṃ śaiśavaṃ bhuktvā duḥkhaṃ paugaṇḍameva ca|

alabdhābhīpsito'jñānādiddhamanyuḥ śucārpitaḥ|| 28

अर्थ

इसी प्रकार बाल्य (कौमार) और पौगण्ड—अवस्थाओंके दुःख भोगकर वह बालक युवावस्थामें पहुँचता है। इस समय उसे यदि कोई इच्छित भोग नहीं प्राप्त होता, तो अज्ञानवश उसका क्रोध उद्दीप्त हो उठता है और वह शोकाकुल हो जाता है॥ २८॥

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