खोटी बुद्धिवाला वह अज्ञानी जीव पंचभूतोंसे रचे हुए इस देहमें मिथ्याभिनिवेशके कारण निरन्तर मैं-मेरेपनका अभिमान करने लगता है॥ ३०॥
भूतैः पञ्चभिरारब्धे देहे देह्यबुधोऽसकृत्।
अहंममेत्यसद्ग्राहः करोति कुमतिर्मतिम्॥ ३०
खोटी बुद्धिवाला वह अज्ञानी जीव पंचभूतोंसे रचे हुए इस देहमें मिथ्याभिनिवेशके कारण निरन्तर मैं-मेरेपनका अभिमान करने लगता है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 393) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/30/