श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तामात्मनो विजानीयात्पत्यपत्यगृहात्मकम्।

दैवोपसादितं मृत्युं मृगयोर्गायनं यथा॥ ४२

tāmātmano vijānīyātpatyapatyagṛhātmakam|

daivopasāditaṃ mṛtyuṃ mṛgayorgāyanaṃ yathā|| 42

अर्थ

स्त्रीमें आसक्त रहनेके कारण तथा अन्त समयमें स्त्रीका ही ध्यान रहनेसे जीवको स्त्रीयोनि प्राप्त होती है। इस प्रकार स्त्रीयोनिको प्राप्त हुआ जीव पुरुषरूपमें प्रतीत होनेवाली मेरी मायाको ही धन, पुत्र और गृह आदि देनेवाला अपना पति मानता रहता है; सो जिस प्रकार व्याधेका गान कानोंको प्रिय लगनेपर भी बेचारे भोले-भाले पशु-पक्षियोंको फँसाकर उनके नाशका ही कारण होता है—उसी प्रकार उन पुत्र, पति और गृह आदिको विधाताकी निश्चित की हुई अपनी मृत्यु ही जाने॥ ४१-४२॥

यह अर्थ श्लोक 41–42 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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