अनुक्रमणिका तृतीय स्कन्ध अध्याय 31 श्लोक 48 ॥ श्रीहरिः ॥
सम्यग्दर्शनया बुद्ध्या योगवैराग्ययुक्तया।
मायाविरचिते लोके चरेन्न्यस्य कलेवरम्॥ ४८
samyagdarśanayā buddhyā yogavairāgyayuktayā|
māyāviracite loke carennyasya kalevaram|| 48
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अतः मुमुक्ष पुरुषको मरणादिसे भय, दीनता अथवा मोह नहीं होना चाहिये। उसे जीवके स्वरूपको जानकर धैर्यपूर्वक निःसंगभावसे विचरना चाहिये तथा इस मायामय संसारमें योग-वैराग्य-युक्त सम्यक् ज्ञानमयी बुद्धिसे शरीरको निक्षेप (धरोहर)-की भाँति रखकर उसके प्रति अनासक्त रहते हुए विचरण करना चाहिये॥ ४७-४८॥
यह अर्थ श्लोक 47–48 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कापिलेयोपाख्याने जीवगतिर्नामैकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 395) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/48/
मुद्रित ग्रन्थमें: प्रथम खण्ड, पृष्ठ 395
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सम्यग्दर्शनया बुद्ध्या योगवैराग्ययुक्तया।
मायाविरचिते लोके चरेन्न्यस्य कलेवरम्॥ ४८
अतः मुमुक्ष पुरुषको मरणादिसे भय, दीनता अथवा मोह नहीं होना चाहिये। उसे जीवके स्वरूपको जानकर धैर्यपूर्वक निःसंगभावसे विचरना चाहिये तथा इस मायामय संसारमें योग-वैराग्य-युक्त सम्यक् ज्ञानमयी बुद्धिसे शरीरको निक्षेप (धरोहर)-की भाँति रखकर उसके प्रति अनासक्त रहते हुए विचरण करना चाहिये॥ ४७-४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 395) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/48/