श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

कृमिभिः क्षतसर्वाङ्गः सौकुमार्यात्प्रतिक्षणम्।

मूर्च्छामाप्नोत्युरुक्लेशस्तत्रत्यैः क्षुधितैर्मुहुः॥ ६

kṛmibhiḥ kṣatasarvāṅgaḥ saukumāryātpratikṣaṇam|

mūrcchāmāpnotyurukleśastatratyaiḥ kṣudhitairmuhuḥ|| 6

अर्थ

वह सुकुमार तो होता ही है; इसलिये जब वहाँके भूखे कीड़े उसके अंग-प्रत्यंग नोचते हैं, तब अत्यन्त क्लेशके कारण वह क्षण-क्षणमें अचेत हो जाता है॥ ६॥

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