॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.32.10
एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टा
ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः।
तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं
ब्रह्म प्रधानमुपया२न्त्यगताभिमानाः॥ १०
evaṃ paretya bhagavantamanupraviṣṭā
ye yogino jitamarunmanaso virāgāḥ|
tenaiva sākamamṛtaṃ puruṣaṃ purāṇaṃ
brahma pradhānamupayāntyagatābhimānāḥ|| 10
अर्थ
जिस समय देवतादिसे श्रेष्ठ ब्रह्माजी अपने द्विपरार्द्धकालके अधिकारको भोगकर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, इन्द्रिय, उनके विषय (शब्दादि) और अहंकारादिके सहित सम्पूर्ण विश्वका संहार करनेकी इच्छासे त्रिगुणात्मिका प्रकृतिके साथ एकरूप होकर निर्विशेष परमात्मामें लीन हो जाते हैं, उस समय प्राण और मनको जीते हुए वे विरक्त योगिगण भी देह त्यागकर उन भगवान् ब्रह्माजीमें ही प्रवेश करते हैं और फिर उन्हींके साथ परमानन्दस्वरूप पुराणपुरुष परब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। इससे पहले वे भगवान्में लीन नहीं हुए; क्योंकि अबतक उनमें अहंकार शेष था॥ ९-१०॥✎ 345 346
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—यान्ति गता०।