श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

स संसृत्य पुनः काले कालेनेश्‍वरमूर्तिना।

जाते गुणव्यतिकरे यथापूर्वं प्रजायते॥ १४

sa saṃsṛtya punaḥ kāle kāleneśvaramūrtinā|

jāte guṇavyatikare yathāpūrvaṃ prajāyate|| 14

अर्थ

वेदगर्भ ब्रह्माजी भी—जो समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंके आदिकारण हैं—मरीचि आदि ऋषियों, योगेश्‍वरों, सनकादिकों तथा योगप्रवर्तक सिद्धोंके सहित निष्काम कर्मके द्वारा आदिपुरुष पुरुषश्रेष्ठ सगुण ब्रह्मको प्राप्त होकर भी भेददृष्टि और कर्तृत्वाभिमानके कारण भगवदिच्छा-से, जब सर्गकाल उपस्थित होता है तब कालरूप ईश्‍वरकी प्रेरणासे गुणोंमें क्षोभ होनेपर फिर पूर्ववत् प्रकट हो जाते हैं॥ १२—१४॥

यह अर्थ श्लोक 12–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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