श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

निवृत्तिधर्मनिरता निर्ममा निरहङ्कृताः।

स्वधर्माख्येन सत्त्वेन परिशुद्धेन चेतसा॥ ६

nivṛttidharmaniratā nirmamā nirahaṅkṛtāḥ|

svadharmākhyena sattvena pariśuddhena cetasā|| 6

अर्थ

जो विवेकी पुरुष अपने धर्मोंका अर्थ और भोग-विलासके लिये उपयोग नहीं करते, बल्कि भगवान्‌की प्रसन्‍नताके लिये ही उनका पालन करते हैं—वे अनासक्त, प्रशान्त, शुद्धचित्त, निवृत्तिधर्मपरायण, ममतारहित और अहंकारशून्य पुरुष स्वधर्मपालनरूप सत्त्वगुणके द्वारा सर्वथा शुद्धचित्त हो जाते हैं॥ ५-६॥✎ 345 346

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #345 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #346 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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