तब देवहूतिजी भी सरस्वतीके मुकुटसदृश अपने आश्रममें अपने पुत्रके उपदेश किये हुए योगसाधनके द्वारा योगाभ्यास करती हुई समाधिमें स्थित हो गयीं॥ १३॥
सा चापि तनयोक्तेन योगादेशेन योगयुक्।
तस्मिन्नाश्रम आपीडे सरस्वत्याः समाहिता॥ १३
तब देवहूतिजी भी सरस्वतीके मुकुटसदृश अपने आश्रममें अपने पुत्रके उपदेश किये हुए योगसाधनके द्वारा योगाभ्यास करती हुई समाधिमें स्थित हो गयीं॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.33.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 402) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/33/13/