श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

सा चापि तनयोक्तेन योगादेशेन१ योगयुक्।

तस्मिन्‍नाश्रम आपीडे२ सरस्वत्याः समाहिता॥ १३

sā cāpi tanayoktena yogādeśena yogayuk|

tasminnāśrama āpīḍe sarasvatyāḥ samāhitā|| 13

अर्थ

तब देवहूतिजी भी सरस्वतीके मुकुटसदृश अपने आश्रममें अपने पुत्रके उपदेश किये हुए योगसाधनके द्वारा योगाभ्यास करती हुई समाधिमें स्थित हो गयीं॥ १३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—योगमार्गेण।

    (मुद्रित पृष्ठ 402)
  2. २

    प्रा० पा०—पीले।

    (मुद्रित पृष्ठ 402)

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