na sasmāra tadā''tmānaṃ svapne dṛṣṭamivotthitaḥ|| 27
अर्थ
अब निरन्तर समाधिस्थ रहनेके कारण उनकी विषयोंके सत्यत्वकी भ्रान्ति मिट गयी और उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि न रही—जैसे जागे हुए पुरुषको अपने स्वप्नमें देखे हुए शरीरकी नहीं रहती॥ २७॥✎ 3501315
नित्यारूढसमाधित्वात्परावृत्तगुणभ्रमा ।
न सस्मार तदाऽऽत्मानं स्वप्ने दृष्टमिवोत्थितः॥ २७
अब निरन्तर समाधिस्थ रहनेके कारण उनकी विषयोंके सत्यत्वकी भ्रान्ति मिट गयी और उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि न रही—जैसे जागे हुए पुरुषको अपने स्वप्नमें देखे हुए शरीरकी नहीं रहती॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.33.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 403) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/33/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#350 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् में → श्रीभगवान्में
#1315 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): परमा-नन्दमें → परमानन्दमें