श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

आस्ते योगं समास्थाय सांख्याचार्यैरभिष्टुतः।

त्रयाणामपि लोका२नामुपशान्त्यै समाहितः॥ ३५

āste yogaṃ samāsthāya sāṃkhyācāryairabhiṣṭutaḥ|

trayāṇāmapi lokānāmupaśāntyai samāhitaḥ|| 35

अर्थ

वहाँ स्वयं समुद्रने उनका पूजन करके उन्हें स्थान दिया। वे तीनों लोकोंको शान्ति प्रदान करनेके लिये योगमार्गका अवलम्बन कर समाधिमें स्थित हो गये हैं। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मुनि और अप्सरागण उनकी स्तुति करते हैं तथा सांख्याचार्यगण भी उनका सब प्रकार स्तवन करते रहते हैं॥ ३४-३५॥

यह अर्थ श्लोक 34–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कानां सुखायास्‍ते समा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 404)

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