श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.33.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

त्वं देहतन्त्रः प्रशमाय पाप्मनां

निदेशभाजां च विभो विभूतये।

यथावतारास्तव सूकरादय-

स्तथायमप्यात्मपथोपलब्धये ॥ ५

tvaṃ dehatantraḥ praśamāya pāpmanāṃ

nideśabhājāṃ ca vibho vibhūtaye|

yathāvatārāstava sūkarādaya-

stathāyamapyātmapathopalabdhaye || 5

अर्थ

विभो! आप पापियोंका दमन और अपने आज्ञाकारी भक्तोंका अभ्युदय एवं कल्याण करनेके लिये स्वेच्छासे देह धारण किया करते हैं। अतः जिस प्रकार आपके वराह आदि अवतार हुए हैं, उसी प्रकार यह कपिलावतार भी मुमुक्षुओंको ज्ञानमार्ग दिखानेके लिये हुआ है॥ ५॥

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