श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तस्यानुरक्तस्य मुनेर्मुकुन्दः

प्रमोदभावानतकन्धरस्य ।

आशृण्वतो मामनुरागहास-

समीक्षया विश्रमयन्‍नुवाच॥ १०

tasyānuraktasya munermukundaḥ

pramodabhāvānatakandharasya |

āśṛṇvato māmanurāgahāsa-

samīkṣayā viśramayannuvāca|| 10

अर्थ

मैत्रेय मुनि भगवान्‌के अनुरागी भक्त हैं। आनन्द और भक्तिभावसे उनकी गर्दन झुक रही थी। उनके सामने ही श्रीहरिने प्रेम एवं मुसकानयुक्त चितवनसे मुझे आनन्दित करते हुए कहा॥ १०॥

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