श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.3

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

भगवान् स्वात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः।

सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत्॥ ३

bhagavān svātmamāyāyā gatiṃ tāmavalokya saḥ|

sarasvatīmupaspṛśya vṛkṣamūlamupāviśat|| 3

अर्थ

भगवान् अपनी मायाकी उस विचित्र गतिको देखकर सरस्वतीके जलसे आचमन करके एक वृक्षके नीचे बैठ गये॥ ३॥

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