॥ श्रीहरिः ॥
भगवान् स्वात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः।
सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत्॥ ३
bhagavān svātmamāyāyā gatiṃ tāmavalokya saḥ|
sarasvatīmupaspṛśya vṛkṣamūlamupāviśat|| 3
अर्थ
भगवान् अपनी मायाकी उस विचित्र गतिको देखकर सरस्वतीके जलसे आचमन करके एक वृक्षके नीचे बैठ गये॥ ३॥
भगवान् स्वात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः।
सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत्॥ ३
भगवान् अपनी मायाकी उस विचित्र गतिको देखकर सरस्वतीके जलसे आचमन करके एक वृक्षके नीचे बैठ गये॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.4.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 249) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/4/3/