दिव्य विशुद्ध-सत्त्वमय अत्यन्त सुन्दर श्याम शरीर है, शान्तिसे भरी रतनारी आँखें हैं। उनकी चार भुजाएँ और रेशमी पीताम्बर देखकर मैंने उनको दूरसे ही पहचान लिया॥ ७॥
श्यामावदातं विरजं प्रशान्तारुणलोचनम्।
दोर्भिश्चतुर्भिर्विदितं पीतकौशाम्बरेण च॥ ७
दिव्य विशुद्ध-सत्त्वमय अत्यन्त सुन्दर श्याम शरीर है, शान्तिसे भरी रतनारी आँखें हैं। उनकी चार भुजाएँ और रेशमी पीताम्बर देखकर मैंने उनको दूरसे ही पहचान लिया॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.4.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 249) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/4/7/