मैत्रेयजी! आप दीनोंपर कृपा करनेवाले हैं; अतः भौंरा जैसे फूलोंमेंसे रस निकाल लेता है, उसी प्रकार इन लौकिक कथाओंमेंसे इनकी सारभूता परम कल्याणकारी पवित्रकीर्ति श्रीहरिकी कथाएँ छाँटकर हमारे कल्याणके लिये सुनाइये॥ १५॥✎ 20915851586
तदस्य कौषारव शर्मदातु-
र्हरेः कथामेव कथासु सारम्।
उद्धृत्य पुष्पेभ्य इवार्तबन्धो
शिवाय नः कीर्तय तीर्थकीर्तेः॥ १५
मैत्रेयजी! आप दीनोंपर कृपा करनेवाले हैं; अतः भौंरा जैसे फूलोंमेंसे रस निकाल लेता है, उसी प्रकार इन लौकिक कथाओंमेंसे इनकी सारभूता परम कल्याणकारी पवित्रकीर्ति श्रीहरिकी कथाएँ छाँटकर हमारे कल्याणके लिये सुनाइये॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 254) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)