श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तदस्य कौषारव शर्मदातु-

र्हरेः कथामेव कथासु सारम्।

उद‍्धृत्य पुष्पेभ्य इवार्तबन्धो

शिवाय नः कीर्तय तीर्थकीर्तेः॥ १५

tadasya kauṣārava śarmadātu-

rhareḥ kathāmeva kathāsu sāram|

uddhṛtya puṣpebhya ivārtabandho

śivāya naḥ kīrtaya tīrthakīrteḥ|| 15

अर्थ

मैत्रेयजी! आप दीनोंपर कृपा करनेवाले हैं; अतः भौंरा जैसे फूलोंमेंसे रस निकाल लेता है, उसी प्रकार इन लौकिक कथाओंमेंसे इनकी सारभूता परम कल्याणकारी पवित्रकीर्ति श्रीहरिकी कथाएँ छाँटकर हमारे कल्याणके लिये सुनाइये॥ १५॥✎ 209 1585 1586

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #209 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1585 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पवित्र-कीर्ति → पवित्रकीर्ति
  • #1586 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोका-लोक-पर्वतसे → लोकालोक-पर्वतसे

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