श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.3

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

जनस्य कृष्णाद्विमुखस्य दैवा-

दधर्मशीलस्य सुदुःखितस्य।

अनुग्रहायेह चरन्ति नूनं

भूतानि भव्यानि जनार्दनस्य॥ ३

janasya kṛṣṇādvimukhasya daivā-

dadharmaśīlasya suduḥkhitasya|

anugrahāyeha caranti nūnaṃ

bhūtāni bhavyāni janārdanasya|| 3

अर्थ

जो लोग दुर्भाग्यवश भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख, अधर्मपरायण और अत्यन्त दुःखी हैं, उनपर कृपा करनेके लिये ही आप-जैसे भाग्यशाली भगवद्भक्त संसारमें विचरा करते हैं॥ ३॥

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