श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः।

नभसोऽनुसृतं स्पर्शं विकुर्वन्‍निर्ममेऽनिलम्॥ ३२

kālamāyāṃśayogena bhagavadvīkṣitaṃ nabhaḥ|

nabhaso'nusṛtaṃ sparśaṃ vikurvannirmame'nilam|| 32

अर्थ

भगवान्‌की दृष्टि जब आकाशपर पड़ी, तब उससे फिर काल, माया और चिदाभासके योगसे स्पर्शतन्मात्र हुआ और उसके विकृत होनेपर उससे वायुकी उत्पत्ति हुई॥ ३२॥✎ 212 213 214

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #212 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #213 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #214 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें