॥ श्रीहरिः ॥
ज्योतिषाम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वद्ब्रह्मवीक्षितम्।
महीं गन्धगुणामाधात्कालमायांशयोगतः॥ ३५
jyotiṣāmbho'nusaṃsṛṣṭaṃ vikurvadbrahmavīkṣitam|
mahīṃ gandhaguṇāmādhātkālamāyāṃśayogataḥ|| 35
अर्थ
तदनन्तर तेजसे युक्त जलने ब्रह्मका दृष्टिपात होनेपर काल, माया और चिदंशके योगसे गन्धगुणमयी पृथ्वीको उत्पन्न किया॥ ३५॥✎ 212 213 214
ज्योतिषाम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वद्ब्रह्मवीक्षितम्।
महीं गन्धगुणामाधात्कालमायांशयोगतः॥ ३५
तदनन्तर तेजसे युक्त जलने ब्रह्मका दृष्टिपात होनेपर काल, माया और चिदंशके योगसे गन्धगुणमयी पृथ्वीको उत्पन्न किया॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 256) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #212 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #213 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #214 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने