ये महत्तत्त्वादिके अभिमानी विकार, विक्षेप और चेतनांशविशिष्ट देवगण श्रीभगवान्के ही अंश हैं किन्तु पृथक्-पृथक् रहनेके कारण जब वे विश्वरचनारूप अपने कार्यमें सफल नहीं हुए, तब हाथ जोड़कर भगवान्से कहने लगे॥ ३७॥✎ 215
एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः।
नानात्वात्स्वक्रियानीशाः प्रोचुः प्राञ्जलयो विभुम्॥ ३७
ये महत्तत्त्वादिके अभिमानी विकार, विक्षेप और चेतनांशविशिष्ट देवगण श्रीभगवान्के ही अंश हैं किन्तु पृथक्-पृथक् रहनेके कारण जब वे विश्वरचनारूप अपने कार्यमें सफल नहीं हुए, तब हाथ जोड़कर भगवान्से कहने लगे॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.5.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 257) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/5/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)