श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.37

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः।

नानात्वात्स्वक्रियानीशाः प्रोचुः प्राञ्जलयो विभुम्॥ ३७

ete devāḥ kalā viṣṇoḥ kālamāyāṃśaliṅginaḥ|

nānātvātsvakriyānīśāḥ procuḥ prāñjalayo vibhum|| 37

अर्थ

ये महत्तत्त्वादिके अभिमानी विकार, विक्षेप और चेतनांशविशिष्ट देवगण श्रीभगवान्‌के ही अंश हैं किन्तु पृथक्-पृथक् रहनेके कारण जब वे विश्‍वरचनारूप अपने कार्यमें सफल नहीं हुए, तब हाथ जोड़कर भगवान्‌से कहने लगे॥ ३७॥✎ 215

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #215 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें