श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

पानेन ते देव कथासुधायाः

प्रवृद्धभक्‍त्या विशदाशया ये।

वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं

यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम्॥ ४५

pānena te deva kathāsudhāyāḥ

pravṛddhabhaktyā viśadāśayā ye|

vairāgyasāraṃ pratilabhya bodhaṃ

yathāñjasānvīyurakuṇṭhadhiṣṇyam|| 45

अर्थ

देव! आपके कथामृतका पान करनेसे उमड़ी हुई भक्तिके कारण जिनका अन्तःकरण निर्मल हो गया है, वे लोग—वैराग्य ही जिसका सार है—ऐसा आत्मज्ञान प्राप्त करके अनायास ही आपके वैकुण्ठधामको चले जाते हैं॥ ४५॥

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