श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.49

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्वं नः सुराणामसि सान्वयानां

कूटस्थ आद्यः पुरुषः पुराणः।

त्वं देव शक्त्यां गुणकर्मयोनौ

रेतस्त्वजायां कविमादधेऽजः॥ ४९

tvaṃ naḥ surāṇāmasi sānvayānāṃ

kūṭastha ādyaḥ puruṣaḥ purāṇaḥ|

tvaṃ deva śaktyāṃ guṇakarmayonau

retastvajāyāṃ kavimādadhe'jaḥ|| 49

अर्थ

आप निर्विकार पुराणपुरुष ही अन्य कार्यवर्गके सहित हम देवताओंके आदि कारण हैं। देव! पहले आप अजन्माहीने सत्त्वादि गुण और जन्मादि कर्मोंकी कारणरूपा मायाशक्तिमें चिदाभासरूप वीर्य स्थापित किया था॥ ४९॥

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