श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

क्रीडन् विधत्ते द्विजगोसुराणां

क्षेमाय कर्माण्यवतारभेदैः।

मनो न तृप्यत्यपि शृण्वतां नः

सुश्लोकमौलेश्‍चरितामृतानि ॥ ७

krīḍan vidhatte dvijagosurāṇāṃ

kṣemāya karmāṇyavatārabhedaiḥ|

mano na tṛpyatyapi śṛṇvatāṃ naḥ

suślokamauleścaritāmṛtāni || 7

अर्थ

ब्राह्मण, गौ और देवताओंके कल्याणके लिये जो अनेकों अवतार धारण करके लीलासे ही नाना प्रकारके दिव्य कर्म करते हैं, वे भी हमें सुनाइये। यशस्वियोंके मुकुटमणि श्रीहरिके लीलामृतका पान करते-करते हमारा मन तृप्त नहीं होता॥ ७॥

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