श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.9

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

येन प्रजानामुत आत्मकर्म-

रूपाभिधानां च भिदां व्यधत्त।

नारायणो विश्‍वसृडात्मयोनि-

रेतच्च नो वर्णय विप्रवर्य॥ ९

yena prajānāmuta ātmakarma-

rūpābhidhānāṃ ca bhidāṃ vyadhatta|

nārāyaṇo viśvasṛḍātmayoni-

retacca no varṇaya vipravarya|| 9

अर्थ

द्विजवर! उन विश्‍वकर्ता स्वयम्भू श्रीनारायणने अपनी प्रजाके स्वभाव, कर्म, रूप और नामोंके भेदकी किस प्रकार रचना की है? भगवन्! मैंने श्रीव्यासजीके मुखसे ऊँच-नीच वर्णोंके धर्म तो कई बार सुने हैं। किन्तु अब श्रीकृष्णकथामृतके प्रवाहको छोड़कर अन्य स्वल्प-सुखदायक धर्मोंसे मेरा चित्त ऊब गया है॥ ९-१०॥✎ 209 1585 1586

यह अर्थ श्लोक 9–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #209 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1585 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पवित्र-कीर्ति → पवित्रकीर्ति
  • #1586 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: लोका-लोक-पर्वतसे → लोकालोक-पर्वतसे

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