श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.6.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तार्तीयेन स्वभावेन भगवन्‍नाभिमाश्रिताः।

उभयोरन्तरं व्योम ये रुद्रपार्षदां गणाः॥ २९

tārtīyena svabhāvena bhagavannābhimāśritāḥ|

ubhayorantaraṃ vyoma ye rudrapārṣadāṃ gaṇāḥ|| 29

अर्थ

इनमें देवतालोग सत्त्वगुणकी अधिकताके कारण स्वर्गलोकमें, मनुष्य और उनके उपयोगी गौ आदि जीव रजोगुणकी प्रधानताके कारण पृथ्वीमें तथा तमोगुणी स्वभाववाले होनेसे रुद्रके पार्षदगण (भूत, प्रेत आदि) दोनोंके बीचमें स्थित भगवान्‌के नाभिस्थानीय अन्तरिक्षलोकमें रहते हैं॥ २८-२९॥

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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