विदुरजी! यह विराट् पुरुष काल, कर्म और स्वभावशक्तिसे युक्त भगवान्की योगमायाके प्रभावको प्रकट करनेवाला है। इसके स्वरूपका पूरा-पूरा वर्णन करनेका कौन साहस कर सकता है॥ ३५॥✎ 222223224225
एतत्क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः।
कः श्रद्दध्यादुपाकर्तुं योगमायाबलोदयम्॥ ३५
विदुरजी! यह विराट् पुरुष काल, कर्म और स्वभावशक्तिसे युक्त भगवान्की योगमायाके प्रभावको प्रकट करनेवाला है। इसके स्वरूपका पूरा-पूरा वर्णन करनेका कौन साहस कर सकता है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.6.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 262) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/6/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#222 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को