॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.7.11
यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुणः।
दृश्यतेऽसन्नपि द्रष्टुरात्मनो नात्मनो गुणः॥ ११
yathā jale candramasaḥ kampādistatkṛto guṇaḥ|
dṛśyate'sannapi draṣṭurātmano nātmano guṇaḥ|| 11
अर्थ
यदि यह कहा जाय कि फिर ईश्वरमें इनकी प्रतीति क्यों नहीं होती, तो इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार जलमें होनेवाली कम्प आदि क्रिया जलमें दीखनेवाले चन्द्रमाके प्रतिबिम्बमें न होनेपर भी भासती है, आकाशस्थ चन्द्रमामें नहीं, उसी प्रकार देहाभिमानी जीवमें ही देहके मिथ्या धर्मोंकी प्रतीति होती है, परमात्मामें नहीं॥ ११॥