ābhātyapārthaṃ nirmūlaṃ viśvamūlaṃ na yadbahiḥ|| 16
अर्थ
विद्वन्! आपने यह बात बहुत ठीक कही कि जीवको जो क्लेशादिकी प्रतीति हो रही है, उसका आधार केवल भगवान्की माया ही है। वह क्लेश मिथ्या एवं निर्मूल ही है; क्योंकि इस विश्वका मूल कारण ही मायाके अतिरिक्त और कुछ नहीं है॥ १६॥✎ 228229230
साध्वेतद् व्याहृतं विद्वन्नात्ममायायनं हरेः।
आभात्यपार्थं निर्मूलं विश्वमूलं न यद्बहिः॥ १६
विद्वन्! आपने यह बात बहुत ठीक कही कि जीवको जो क्लेशादिकी प्रतीति हो रही है, उसका आधार केवल भगवान्की माया ही है। वह क्लेश मिथ्या एवं निर्मूल ही है; क्योंकि इस विश्वका मूल कारण ही मायाके अतिरिक्त और कुछ नहीं है॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 264) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/7/16/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—त०।
(मुद्रित पृष्ठ 264)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#228 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को