विदुरजीने पूछा—ब्रह्मन्! भगवान् तो शुद्ध बोधस्वरूप, निर्विकार और निर्गुण हैं; उनके साथ लीलासे भी गुण और क्रियाका सम्बन्ध कैसे हो सकता है॥ २॥✎ 226
ब्रह्मन् कथं भगवतश्चिन्मात्रस्याविकारिणः।
लीलया चापि युज्येरन्निर्गुणस्य गुणाः क्रियाः॥ २
विदुरजीने पूछा—ब्रह्मन्! भगवान् तो शुद्ध बोधस्वरूप, निर्विकार और निर्गुण हैं; उनके साथ लीलासे भी गुण और क्रियाका सम्बन्ध कैसे हो सकता है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.7.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 263) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/7/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)