श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

येन वा भगवांस्तुष्येद्धर्मयोनिर्जनार्दनः।

सम्प्रसीदति वा येषामेतदाख्याहि चानघ॥ ३५

yena vā bhagavāṃstuṣyeddharmayonirjanārdanaḥ|

samprasīdati vā yeṣāmetadākhyāhi cānagha|| 35

अर्थ

निष्पाप मैत्रेयजी! धर्मके मूल कारण श्रीजनार्दनभगवान् किस आचरणसे सन्तुष्ट होते हैं और किनपर अनुग्रह करते हैं, यह वर्णन कीजिये॥ ३५॥

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