श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.7.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

एतान्मे पृच्छतः प्रश्नान् हरेः कर्मविवित्सया।

ब्रूहि मेऽज्ञस्य मित्रत्वादजया नष्टचक्षुषः॥ ४०

etānme pṛcchataḥ praśnān hareḥ karmavivitsayā|

brūhi me'jñasya mitratvādajayā naṣṭacakṣuṣaḥ|| 40

अर्थ

ब्रह्मन्! माया-मोहके कारण मेरी विचारदृष्टि नष्ट हो गयी है। मैं अज्ञ हूँ, आप मेरे परम सुहृद‍् हैं; अतः श्रीहरिलीलाका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे मैंने जो प्रश्न किये हैं, उनका उत्तर मुझे दीजिये॥ ४०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें