ऐसा सोचकर वे उस कमलकी नालके सूक्ष्म छिद्रोंमें होकर उस जलमें घुसे। किन्तु उस नालके आधारको खोजते-खोजते नाभि-देशके समीप पहुँच जानेपर भी वे उसे पा न सके॥ १९॥
स इत्थमुद्वीक्ष्य तदब्जनाल-
नाडीभिरन्तर्जलमाविवेश ।
नार्वाग्गतस्तत्खरनालनाल-
नाभिं विचिन्वंस्तदविन्दताजः॥ १९
ऐसा सोचकर वे उस कमलकी नालके सूक्ष्म छिद्रोंमें होकर उस जलमें घुसे। किन्तु उस नालके आधारको खोजते-खोजते नाभि-देशके समीप पहुँच जानेपर भी वे उसे पा न सके॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.8.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 269) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/8/19/