॥ श्रीहरिः ॥
सोऽहं नृणां क्षुल्लसुखाय दुःखं
महद्गतानां विरमाय तस्य।
प्रवर्तये भागवतं पुराणं
यदाह साक्षाद्भगवानृषिभ्यः॥ २
so'haṃ nṛṇāṃ kṣullasukhāya duḥkhaṃ
mahadgatānāṃ viramāya tasya|
pravartaye bhāgavataṃ purāṇaṃ
yadāha sākṣādbhagavānṛṣibhyaḥ|| 2
अर्थ
अब मैं, क्षुद्र विषय-सुखकी कामनासे महान् दुःखको मोल लेनेवाले पुरुषोंकी दुःखनिवृत्तिके लिये, श्रीमद्भागवतपुराण प्रारम्भ करता हूँ—जिसे स्वयं श्रीसंकर्षणभगवान्ने सनकादि ऋषियोंको सुनाया था॥ २॥✎ 232 1588
सोऽहं नृणां क्षुल्लसुखाय दुःखं
महद्गतानां विरमाय तस्य।
प्रवर्तये भागवतं पुराणं
यदाह साक्षाद्भगवानृषिभ्यः॥ २
अब मैं, क्षुद्र विषय-सुखकी कामनासे महान् दुःखको मोल लेनेवाले पुरुषोंकी दुःखनिवृत्तिके लिये, श्रीमद्भागवतपुराण प्रारम्भ करता हूँ—जिसे स्वयं श्रीसंकर्षणभगवान्ने सनकादि ऋषियोंको सुनाया था॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.8.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 267) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/8/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #232 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीसंकर्षणभगवान् ने → श्रीसंकर्षणभगवान्ने
- #1588 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: साधु-पुरुषोंके → साधुपुरुषोंके