श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.8.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सोऽहं नृणां क्षुल्लसुखाय दुःखं

महद्गतानां विरमाय तस्य।

प्रवर्तये भागवतं पुराणं

यदाह साक्षाद्भगवानृषिभ्यः॥ २

so'haṃ nṛṇāṃ kṣullasukhāya duḥkhaṃ

mahadgatānāṃ viramāya tasya|

pravartaye bhāgavataṃ purāṇaṃ

yadāha sākṣādbhagavānṛṣibhyaḥ|| 2

अर्थ

अब मैं, क्षुद्र विषय-सुखकी कामनासे महान् दुःखको मोल लेनेवाले पुरुषोंकी दुःखनिवृत्तिके लिये, श्रीमद्भागवतपुराण प्रारम्भ करता हूँ—जिसे स्वयं श्रीसंकर्षणभगवान्‌ने सनकादि ऋषियोंको सुनाया था॥ २॥✎ 232 1588

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #232 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीसंकर्षणभगवान् ने → श्रीसंकर्षणभगवान्‌ने
  • #1588 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: साधु-पुरुषोंके → साधुपुरुषोंके

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