अन्तमें विफलमनोरथ हो वे वहाँसे लौट आये और पुनः अपने आधारभूत कमलपर बैठकर धीरे-धीरे प्राणवायुको जीतकर चित्तको निःसंकल्प किया और समाधिमें स्थित हो गये॥ २१॥
ततो निवृत्तोऽप्रतिलब्धकामः
स्वधिष्ण्यमासाद्य पुनः स देवः।
शनैर्जितश्वासनिवृत्तचित्तो
न्यषीददारूढसमाधियोगः ॥ २१
अन्तमें विफलमनोरथ हो वे वहाँसे लौट आये और पुनः अपने आधारभूत कमलपर बैठकर धीरे-धीरे प्राणवायुको जीतकर चित्तको निःसंकल्प किया और समाधिमें स्थित हो गये॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.8.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 270) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/8/21/