॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.9.13
पुंसामतो विविधकर्मभिरध्वराद्यै-
र्दानेन चोग्रतपसा व्रतचर्यया च।
आराधनं भगवतस्तव सत्क्रियार्थो
धर्मोऽर्पितः कर्हिचिद्ध्रियते न यत्र॥ १३
puṃsāmato vividhakarmabhiradhvarādyai-
rdānena cogratapasā vratacaryayā ca|
ārādhanaṃ bhagavatastava satkriyārtho
dharmo'rpitaḥ karhiciddhriyate na yatra|| 13
अर्थ
जो कर्म आपको अर्पण कर दिया जाता है, उसका कभी नाश नहीं होता—वह अक्षय हो जाता है। अतः नाना प्रकारके कर्म—यज्ञ, दान, कठिन तपस्या और व्रतादिके द्वारा आपकी प्रसन्नता प्राप्त करना ही मनुष्यका सबसे बड़ा कर्मफल है, क्योंकि आपकी प्रसन्नता होनेपर ऐसा कौन फल है जो सुलभ नहीं हो जाता॥ १३॥✎ 238