श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

पुंसामतो विविधकर्मभिरध्वराद्यै-

र्दानेन चोग्रतपसा व्रतचर्यया च।

आराधनं भगवतस्तव सत्क्रियार्थो

धर्मोऽर्पितः कर्हिचिद्ध्रियते न यत्र॥ १३

puṃsāmato vividhakarmabhiradhvarādyai-

rdānena cogratapasā vratacaryayā ca|

ārādhanaṃ bhagavatastava satkriyārtho

dharmo'rpitaḥ karhiciddhriyate na yatra|| 13

अर्थ

जो कर्म आपको अर्पण कर दिया जाता है, उसका कभी नाश नहीं होता—वह अक्षय हो जाता है। अतः नाना प्रकारके कर्म—यज्ञ, दान, कठिन तपस्या और व्रतादिके द्वारा आपकी प्रसन्‍नता प्राप्त करना ही मनुष्यका सबसे बड़ा कर्मफल है, क्योंकि आपकी प्रसन्‍नता होनेपर ऐसा कौन फल है जो सुलभ नहीं हो जाता॥ १३॥✎ 238

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #238 शब्दोंके बीचका स्थान: पुरुषोत्तमभगवान् को → पुरुषोत्तमभगवान्‌को

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