श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यस्माद्बिभेम्यहमपि द्विपरार्धधिष्ण्य-

मध्यासितः सकललोकनमस्कृतं यत्।

तेपे तपो बहुसवोऽवरुरुत्समान-

स्तस्मै नमो भगवतेऽधिमखाय तुभ्यम्॥ १८

yasmādbibhemyahamapi dviparārdhadhiṣṇya-

madhyāsitaḥ sakalalokanamaskṛtaṃ yat|

tepe tapo bahusavo'varurutsamāna-

stasmai namo bhagavate'dhimakhāya tubhyam|| 18

अर्थ

यद्यपि मैं सत्यलोकका अधिष्ठाता हूँ, जो दो परार्द्धपर्यन्त रहनेवाला और समस्त लोकोंका वन्दनीय है, तो भी आपके उस कालरूपसे डरता रहता हूँ। उससे बचने और आपको प्राप्त करनेके लिये ही मैंने बहुत समयतक तपस्या की है। आप ही अधियज्ञरूपसे मेरी इस तपस्याके साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ १८॥✎ 238

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #238 शब्दोंके बीचका स्थान: पुरुषोत्तमभगवान् को → पुरुषोत्तमभगवान्‌को

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