श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं

जिघ्रन्ति कर्णविवरैः श्रुतिवातनीतम्।

भक्‍त्या गृहीतचरणः परया च तेषां

नापैषि नाथ हृदयाम्बुरुहात्स्वपुंसाम्॥ ५

ye tu tvadīyacaraṇāmbujakośagandhaṃ

jighranti karṇavivaraiḥ śrutivātanītam|

bhaktyā gṛhītacaraṇaḥ parayā ca teṣāṃ

nāpaiṣi nātha hṛdayāmburuhātsvapuṃsām|| 5

अर्थ

मेरे स्वामी! जो लोग वेदरूप वायुसे लायी हुई आपके चरणरूप कमलकोशकी गन्धको अपने कर्णपुटोंसे ग्रहण करते हैं, उन अपने भक्तजनोंके हृदय-कमलसे आप कभी दूर नहीं होते; क्योंकि वे पराभक्तिरूप डोरीसे आपके पादपद्मोंको बाँध लेते हैं॥ ५॥

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