श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

भगवानपि भारत तदुपनीतार्हणः सूक्तवाकेनातितरामुदितगुणगणावतारसुजयः प्रियव्रतमादिपुरुषस्तं सदयहासावलोक इति होवाच॥ १०॥✎ 1043

bhagavānapi bhārata tadupanītārhaṇaḥ sūktavākenātitarāmuditaguṇagaṇāvatārasujayaḥ priyavratamādipuruṣastaṃ sadayahāsāvaloka iti hovāca|| 10||

अर्थ

परीक्षित्! नारदजीने उनकी अनेक प्रकारसे पूजा की और सुमधुर वचनोंमें उनके गुण और अवतारकी उत्कृष्टताका वर्णन किया। तब आदिपुरुष भगवान् ब्रह्माजीने प्रियव्रतकी ओर मन्द मुसकानयुक्त दयादृष्टिसे देखते हुए इस प्रकार कहा॥ १०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1043 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रियव्रतमा-दिपुरुषस्तं → प्रियव्रतमादिपुरुषस्तं

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