श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.17

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

भयं प्रमत्तस्य वनेष्वपि स्याद्

यतः स आस्ते सहषट्सपत्नः।

जितेन्द्रियस्यात्मरतेर्बुधस्य

गृहाश्रमः किं नु करोत्यवद्यम्॥ १७

bhayaṃ pramattasya vaneṣvapi syād

yataḥ sa āste sahaṣaṭsapatnaḥ|

jitendriyasyātmaraterbudhasya

gṛhāśramaḥ kiṃ nu karotyavadyam|| 17

अर्थ

जो पुरुष इन्द्रियोंके वशीभूत है, वह वन-वनमें विचरण करता रहे तो भी उसे जन्म-मरणका भय बना ही रहता है; क्योंकि बिना जीते हुए मन और इन्द्रियरूपी उसके छः शत्रु कभी उसका पीछा नहीं छोड़ते। जो बुद्धिमान् पुरुष इन्द्रियोंको जीतकर अपनी आत्मामें ही रमण करता है, उसका गृहस्थाश्रम भी क्या बिगाड़ सकता है?॥ १७॥

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