॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.1.29
एवमुपशमायनेषु स्वतनयेष्वथ जगतीपतिर्जगतीमर्बुदान्येकादश परिवत्सराणामव्याहताखिलपुरुषकारसारसम्भृतदोर्दण्डयुगलापीडितमौर्वीगुणस्तनितविरमितधर्मप्रतिपक्षो बर्हिष्मत्याश्चानुदिनमेधमानप्रमोद१प्रसरणयौषि२ण्यव्रीडाप्रमुषितहासावलोकरुचिरक्ष्वेल्यादिभिः पराभूयमानविवेक३ इवानवबुध्यमान इव महामना बुभुजे॥ २९॥
evamupaśamāyaneṣu svatanayeṣvatha jagatīpatirjagatīmarbudānyekādaśa parivatsarāṇāmavyāhatākhilapuruṣakārasārasambhṛtadordaṇḍayugalāpīḍitamaurvīguṇastanitaviramitadharmapratipakṣo barhiṣmatyāścānudinamedhamānapramodaprasaraṇayauṣiṇyavrīḍāpramuṣitahāsāvalokarucirakṣvelyādibhiḥ parābhūyamānaviveka ivānavabudhyamāna iva mahāmanā bubhuje|| 29||
अर्थ
इस प्रकार कवि आदि तीन पुत्रोंके निवृत्तिपरायण हो जानेपर राजा प्रियव्रतने ग्यारह अर्बुद वर्षोंतक पृथ्वीका शासन किया। जिस समय वे अपनी अखण्ड पुरुषार्थमयी और वीर्यशालिनी भुजाओंसे धनुषकी डोरी खींचकर टंकार करते थे, उस समय डरके मारे सभी धर्मद्रोही न जाने कहाँ छिप जाते थे। प्राणप्रिया बर्हिष्मतीके दिन-दिन बढ़नेवाले आमोद-प्रमोद और अभ्युत्थानादि क्रीडाओंके कारण तथा उसके स्त्री-जनोचित हाव-भाव, लज्जासे संकुचित मन्दहास्य-युक्त चितवन और मनको भानेवाले विनोद आदिसे महामना प्रियव्रत विवेकहीन व्यक्तिकी भाँति आत्म-विस्मृतसे होकर सब भोगोंको भोगने लगे। किन्तु वास्तवमें ये उनमें आसक्त नहीं थे॥ २९॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—प्रमोदमोद प्रसरण०।
- २
प्रा० पा०—यौषण्यव्रीडाप्रमोदित०।
- ३
प्रा० पा०—विवेको नावबुध्यमा०।