श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.34

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

क्षारोदेक्षुरसोदसुरोदघृतोदक्षीरोददधिमण्डोदशुद्धोदाः सप्त जलधयः सप्त द्वीपपरिखा१ इवाभ्यन्तरद्वीपसमाना एकैकश्येन२ यथानुपूर्वं सप्तस्वपि बहिर्द्वीपेषु पृथक्परित३ उपकल्पितास्तेषु४ जम्ब्वादिषु बर्हिष्मतीपतिरनुव्रतानात्मजानाग्नीध्रेध्मजिह्वयज्ञबाहु५हिरण्यरेतोघृतपृष्ठमेधातिथिवीतिहोत्रसंज्ञान् ६यथासंख्येन एकैकस्मिन् एकमेवाधिपतिं विदधे॥ ३३॥ दुहितरं चोर्जस्वतीं नामोशनसे प्रायच्छद्यस्यामासीद् देवयानी नाम काव्यसुता॥ ३४॥

duhitaraṃ corjasvatīṃ nāmośanase prāyacchadyasyāmāsīd devayānī nāma kāvyasutā|| 34||

अर्थ

उन्होंने अपनी कन्या ऊर्जस्वतीका विवाह शुक्राचार्यजीसे किया; उसीसे शुक्रकन्या देवयानीका जन्म हुआ॥ ३४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—द्वीपशिखाभ्यन्तरे द्वीप०।

    (मुद्रित पृष्ठ 581)
  2. २

    प्रा० पा०—एकैकस्येव।

    (मुद्रित पृष्ठ 581)
  3. ३

    प्रा० पा०—पृथक् परिधय उपकल्पिता०।

    (मुद्रित पृष्ठ 581)
  4. ४

    प्रा० पा०—तेषु बर्हिष्मतीपति०।

    (मुद्रित पृष्ठ 581)
  5. ५

    प्रा० पा०—वाह०।

    (मुद्रित पृष्ठ 581)
  6. ६

    प्रा० पा०—यथासंख्यकमेकैकस्मिन्‍नेकमेवाधि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 581)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें