श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.1.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

अथ ह भगवानादिदेव एतस्य गुणविसर्गस्य४ परिबृंहणानुध्यानव्यवसितसकलजगदभिप्राय आत्मयोनिरखि५लनिगमनिजगणपरिवेष्टितः स्वभवनादवततार॥ ७॥ स तत्र६ तत्र गगनतल उडुपतिरिव विमानावलिभिरनुपथममरपरिवृढैर७भिपूज्यमानः पथि पथि च वरूथशः सिद्धगन्धर्वसाध्यचारणमुनिगणैरुपगीयमानो गन्धमादनद्रोणीमवभासयन्‍नुपससर्प॥ ८॥ तत्र ह वा एनं देवर्षिर्हंसयानेन पितरं भगवन्तं हिरण्यगर्भमुपलभमानः सहसैवोत्थायार्हणेन सह पितापुत्राभ्यामवहिताञ्जलिरुपतस्थे॥ ९॥ ✎ 926

sa tatra tatra gaganatala uḍupatiriva vimānāvalibhiranupathamamaraparivṛḍhairabhipūjyamānaḥ pathi pathi ca varūthaśaḥ siddhagandharvasādhyacāraṇamunigaṇairupagīyamāno gandhamādanadroṇīmavabhāsayannupasasarpa|| 8||

अर्थ

आकाशमें जहाँ-तहाँ विमानोंपर चढ़े हुए इन्द्रादि प्रधान-प्रधान देवताओंने उनका पूजन किया तथा मार्गमें टोलियाँ बाँधकर आये हुए सिद्ध, गन्धर्व, साध्य, चारण और मुनिजनने स्तवन किया। इस प्रकार जगह-जगह आदर-सम्मान पाते वे साक्षात् नक्षत्रनाथ चन्द्रमाके समान गन्धमादनकी घाटीको प्रकाशित करते हुए प्रियव्रतके पास पहुँचे॥ ८॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—सर्गस्य बृंहणा।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  2. ५

    प्रा० पा०—रखिलनिजगणपरिवेष्टितः।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  3. ६

    प्रा० पा०—तत्र गगनतले।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
  4. ७

    प्रा० पा०—ममरपरिवृन्दैरभिपू०।

    (मुद्रित पृष्ठ 576)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #926 शब्दोंके बीचका स्थान: स्वभवनादवततार॥७॥ → स्वभवनादवततार॥ ७॥

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