श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.10.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अहं च योगेश्‍वरमात्मतत्त्व-

विदां मुनीनां परमं गुरुं वै।

प्रष्टुं प्रवृत्तः किमिहारणं तत्

साक्षाद्धरिं ज्ञानकलावतीर्णम्॥ १९

ahaṃ ca yogeśvaramātmatattva-

vidāṃ munīnāṃ paramaṃ guruṃ vai|

praṣṭuṃ pravṛttaḥ kimihāraṇaṃ tat

sākṣāddhariṃ jñānakalāvatīrṇam|| 19

अर्थ

मैं आत्मज्ञानी मुनियोंके परम गुरु और साक्षात् श्रीहरिकी ज्ञानशक्तिके अवतार योगेश्‍वर भगवान् कपिलसे यह पूछनेके लिये जा रहा था कि इस लोकमें एकमात्र शरण लेनेयोग्य कौन है॥ १९॥

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