॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.10.8
एवं बह्वबद्धमपि भाषमाणं नरदेवाभिमानं रजसा तमसानुविद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ८॥
evaṃ bahvabaddhamapi bhāṣamāṇaṃ naradevābhimānaṃ rajasā tamasānuviddhena madena tiraskṛtāśeṣabhagavatpriyaniketaṃ paṇḍitamāninaṃ sa bhagavān brāhmaṇo brahmabhūtaḥ sarvabhūtasuhṛdātmā yogeśvaracaryāyāṃ nātivyutpannamatiṃ smayamāna iva vigatasmaya idamāha || 8||
अर्थ
रहूगणको राजा होनेका अभिमान था, इसलिये वह इसी प्रकार बहुत-सी अनाप-शनाप बातें बोल गया। वह अपनेको बड़ा पण्डित समझता था, अतः रज-तमयुक्त अभिमानके वशीभूत होकर उसने भगवान्के अनन्य प्रीतिपात्र भक्तवर भरतजीका तिरस्कार कर डाला। योगेश्वरोंकी विचित्र कहनी-करनीका तो उसे कुछ पता ही न था। उसकी ऐसी कच्ची बुद्धि देखकर वे सम्पूर्ण प्राणियोंके सुहृद् एवं आत्मा, ब्रह्मभूत ब्राह्मणदेवता मुसकराये और बिना किसी प्रकारका अभिमान किये इस प्रकार कहने लगे॥ ८॥