श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.14

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यथानिलः स्थावरजङ्गमाना-

मात्मस्वरूपेण निविष्ट ईशेत्।

एवं परो भगवान् वासुदेवः

क्षेत्रज्ञ आत्मेदमनुप्रविष्टः॥ १४

yathānilaḥ sthāvarajaṅgamānā-

mātmasvarūpeṇa niviṣṭa īśet|

evaṃ paro bhagavān vāsudevaḥ

kṣetrajña ātmedamanupraviṣṭaḥ|| 14

अर्थ

जिस प्रकार वायु सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंमें प्राणरूपसे प्रविष्ट होकर उन्हें प्रेरित करती है, उसी प्रकार वह परमेश्‍वर भगवान् वासुदेव सर्वसाक्षी आत्मस्वरूपसे इस सम्पूर्ण प्रपंचमें ओत-प्रोत है॥ १४॥

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