श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद्

वरीयसीरपि३ वाचः समासन्।

स्वप्ने निरुक्‍त्या गृहमेधिसौख्यं

न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात्॥ ३

na tasya tattvagrahaṇāya sākṣād

varīyasīrapi vācaḥ samāsan|

svapne niruktyā gṛhamedhisaukhyaṃ

na yasya heyānumitaṃ svayaṃ syāt|| 3

अर्थ

जिसे गृहस्थोचित यज्ञादि कर्मोंसे प्राप्त होनेवाला स्वर्गादि सुख स्वप्नके समान हेय नहीं जान पड़ता, उसे तत्त्वज्ञान करानेमें साक्षात् उपनिषद्-वाक्य भी समर्थ नहीं है॥ ३॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—गरीयसीरपि।

    (मुद्रित पृष्ठ 620)

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