श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.12.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

शोच्यानिमांस्त्वमधिकष्टदीनान्

विष्ट्या निगृह्णन्‍निरनुग्रहोऽसि।

जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो

न शोभसे वृद्धसभासु धृष्टः॥ ७

śocyānimāṃstvamadhikaṣṭadīnān

viṣṭyā nigṛhṇanniranugraho'si|

janasya goptāsmi vikatthamāno

na śobhase vṛddhasabhāsu dhṛṣṭaḥ|| 7

अर्थ

किन्तु इसीसे तुम्हारी कोई श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती, वास्तवमें तो तुम बड़े क्रूर और धृष्ट ही हो। तुमने इन बेचारे दीन-दुःखिया कहारोंको बेगारमें पकड़कर पालकीमें जोत रखा है और फिर महापुरुषोंकी सभामें बढ़-बढ़कर बातें बनाते हो कि मैं लोकोंकी रक्षा करनेवाला हूँ। यह तुम्हें शोभा नहीं देता॥ ७॥

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