॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.13.17
तैर्वञ्चितो हंसकुलं समाविश-
न्नरोचयन् शीलमुपैति वानरान्।
तज्जातिरासेन सुनिर्वृतेन्द्रियः१
परस्परोद्वीक्षणविस्मृतावधिः ॥ १७
tairvañcito haṃsakulaṃ samāviśa-
nnarocayan śīlamupaiti vānarān|
tajjātirāsena sunirvṛtendriyaḥ
parasparodvīkṣaṇavismṛtāvadhiḥ || 17
अर्थ
जब उनसे धोखा उठाता है, तब हंसोंकी पंक्तिमें प्रवेश करना चाहता है; किन्तु उसे उनका आचार नहीं सुहाता, इसलिये वानरोंमें मिलकर उनके जातिस्वभावके अनुसार दाम्पत्य सुखमें रत रहकर विषयभोगोंसे इन्द्रियोंको तृप्त करता रहता है और एक-दूसरेका मुख देखते-देखते अपनी आयुकी अवधिको भूल जाता है॥ १७॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—सुनिर्जितेन्द्रियः।