श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

क्‍वचिद्वितोयाः सरितोऽभियाति

परस्परं चालषते निरन्धः।

आसाद्य दावं क्‍वचिदग्‍नितप्तो

निर्विद्यते क्‍व च यक्षैर्हृतासुः॥ ६

kvacidvitoyāḥ sarito'bhiyāti

parasparaṃ cālaṣate nirandhaḥ|

āsādya dāvaṃ kvacidagnitapto

nirvidyate kva ca yakṣairhṛtāsuḥ|| 6

अर्थ

कभी जलहीन नदियोंकी ओर जाता है, कभी अन्‍न न मिलनेपर आपसमें एक-दूसरेसे भोजनप्राप्तिकी इच्छा करता है, कभी दावानलमें घुसकर अग्‍निसे झुलस जाता है और कभी यक्षलोग इसके प्राण खींचने लगते हैं तो यह खिन्‍न होने लगता है॥ ६॥

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